NDTV और अर्चना कॉम्प्लेक्स के साथ बीते दिनों की यादें


आशियाना, दीवारें, और रिश्ते – ये सिर्फ ईंट-पत्थर या बंधनों से नहीं बनते, बल्कि उन अनुभवों और भावनाओं से बनते हैं, जिन्हें हम वहां जीते हैं। अर्चना कॉम्प्लेक्स, ग्रेटर कैलाश, सिर्फ एक इमारत नहीं थी; यह उन यादों की संग्रहालय थी, जिन्होंने हमारी ज़िन्दगी को संवारने में अहम भूमिका निभाई। 


NDTV में बिताए वे वक्त मेरे जीवन के अनमोल हिस्सा रहे हैं। जब मैंने पहली बार अर्चना कॉम्प्लेक्स में कदम रखा था, तो मेरे दिल में एक अजीब सा उत्साह और रोमांच था। वो टेढ़ी सीढ़ियां जो अपने आप में एक पहचान हैं, जैसे ndtv का माइक, वो दीवारें, वो दफ्तर, कैंटिन, वहां की रात और वहां के लोग – सब कुछ मेरे दिल के बहुत करीब था। उन सीढ़ियों पर चलते हुए, मैंने अपने सपनों को साकार होते देखा था। 


NDTV के दफ्तर ने मुझे न केवल एक पेशेवर, बल्कि एक बेहतर इंसान भी बनाया। वहां बिताए गए हर पल ने मुझे बेहतर बनाया, मुझे प्रेरित किया, और मेरे जीवन के हर पहलू को समृद्ध किया। मैं अभी NDTV में नहीं हूं लेकिन जब NDTV का ऑफिस नई जगह शिफ्ट हो रहा है, तो दिल में एक अजीब सा खालीपन महसूस हो रहा है। अर्चना कॉम्प्लेक्स की हर दीवार, हर कोना, मेरे लिए खास था। वहां के हर दिन ने मुझे कुछ नया सिखाया और मैं आज जिस मुकाम पर हूं, वहां तक पहुंचाया। 


NDTV ने अच्छे दोस्तों से मिलवाया पारिवारिक माहौल दिया। संतोष सर, देशबंधु सर, अवतंस सर, समर भईया, आरिफ सर, लक्ष्मी सर, सचिन भईया, शिव ओम् सर, प्रभान्शू सर, पुलकित सर, संदीप सर और शानदार दोस्त निशांत, मोहित, प्रेरणा, नमिता, प्रिय राज, इकबाल, शशि रंजन जैसे अद्भुत लोगों का मिलना भी बड़ी उपलब्धि रही। 


आज जब मैं वस्त्र मंत्रालय में काम कर रहा हूं, तो NDTV के साथ बिताए वो दिन अक्सर याद आते हैं। अर्चना कॉम्प्लेक्स की यादें हमेशा मेरे दिल के करीब रहेंगी। अर्चना कॉम्प्लेक्स, तुम मेरे लिए सिर्फ एक इमारत नहीं हो, तुम मेरे संघर्षों, मेरी सफलताओं, और मेरे सपनों की साथी हो। तुम्हारे साथ बिताए गए वे दिन मेरी यादों का अनमोल हिस्सा हैं। 


अब, NDTV के नए अध्याय की शुरुआत हो रही है। नई जगह, नए लोग, और नई यादें इंतजार में हैं। लेकिन अर्चना कॉम्प्लेक्स का वो पुराना आशियाना और उसके साथ जुड़ी यादें, हमेशा हमारे दिल में जिंदा रहेंगी। अलविदा, अर्चना कॉम्प्लेक्स। तुम हमेशा मेरे जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहोगी। इन भावुक पलों को संजोते हुए, आगे बढ़ने का समय है।


#NDTV #NDTVIndia #NDTVRAJASTHAN #ndtvnews

युवाओं से उम्मीद करें लेकिन उन्हें समझें भी



नई पीढ़ी से अपेक्षाएँ तो हमेशा से की जाती रही हैं और हमेशा की जाती रहेंगी। इन दिनों भी उनसे हर असफलता को सफलता में बदलने की, हर अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलने की अपेक्षाएँ की जा रही हैं, लेकिन इस परिवर्तन के लिए उन्हें कुछ दिया जाना चाहिए। इस बारे में घोर उपेक्षा बरती जाती है। यह बात अटपटी भले ही लगे, पर स्वस्थ समीक्षा के क्रम में इसे नकारा या झुठलाया नहीं जा सकता। उनकी शिक्षा के लिए शिक्षण संस्थानों की संख्या बढ़ाई जा रही है, लेकिन वे संस्थान अपने मूल प्रयोजन की पूर्ति कितने अंशों में कर पा रहे हैं, इस ओर कोई ध्यान नहीं देना चाहता। 

उनसे अच्छा जीवन जीने की उम्मीद तो की जाती है, लेकिन जीवन की बारीकियाँ, वास्तविकताएँ उन्हें समझाने के लिए न शिक्षक तैयार होते हैं और न अभिभावक। उनसे संयमशीलता की आशा करने वाले उनके लिए उसके अनुरूप उदाहरण एवं वातावरण प्रस्तुत करने से हमेशा कतराते रहते हैं। उनकी शक्ति का मनचाहा उपयोग कर लेने में सभी को उत्साह है, लेकिन उनका 'मन' ठीक करने में किसी को रस नहीं। आदेश के अनुगमन के लिए उन्हें उपदेश तो बहुत दिए जाते हैं, लेकिन यदि वे उस रास्ते पर चलना चाहें तो उनका साथ देने के लिए कोई तैयार नहीं होता।

ऐसे ढेरों उदाहरण सामने दिखाई देते हैं, जिनमें यह कटु सत्य स्वीकार करना है कि नई पीढ़ी से जितनी अधिक अपेक्षाएँ की जाती हैं, व्यावहारिक स्तर पर उनके प्रति उतनी ही उपेक्षा भी बरती जाती है। उनके हित की कामना करने वाले तो बहुत हैं, लेकिन उनके हित के लिए उपयुक्त लोग तैयार नहीं होते। यह अभाव मिटाना होगा, तभी नई पीढ़ी से प्रगति के स्वप्न साकार हो सकेंगे। युवाओं को लेकर के बेहद जरूरी संवाद परीक्षा पर चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अभिभावकों और शिक्षकों को अपने बच्चों, विद्यार्थियों को समझने और उनके प्रति नर्म व्यवहार करने की सलाह दी। जो की परीक्षा पूर्व बेहद जरूरी है युवा छात्र उस दौरान तनाव में होते हैं। वे अपने हम उम्र साथियों से सार्थक संवाद भी नहीं कर सकते, उन्हें किसी बड़े के मार्गदर्शन या सलाह की जरूरत होती है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी परीक्षा पर चर्चा संवाद के दौरान बेहद जरूरी बात कहते हैं कि हर मां-बाप अपने बच्चों का सही मूल्यांकन करें और बच्चों के भीतर हीन भावना को ना आने दें। आप हर पल टोका-टोकी के जरिए आप अपने बच्चों को 'मोल्ड' नहीं कर सकते। ऐसा करना उनके तनाव का अलग कारण बन सकता है। वे शिक्षकों से कहते हैं कि हमारे शिक्षक विद्यार्थियों के साथ जितना अपनापन बढ़ाएंगे उतना बेहतर होगा। जब विद्यार्थी आपसे कोई सवाल करता है तो वह आपके ज्ञान को परखता नहीं है, बल्कि वह नई-नई चीजों को जानना चाहता है। विद्यार्थी जीवन में सवाल को लेकर जिज्ञासा ही उसकी बहुत बड़ी अमानत होती है। 

प्रधानमंत्री युवाओं को प्रेरित करते हुए कहते हैं कि हम दिन-रात कॉम्पिटिशन के भाव में जीते हैं। हमें अपने लिए जीना होगा, अपने में जियें। अपनों से सीखते हुए जियें। सीखना सबसे चाहिए लेकिन अपने भीतर के सामर्थ्य पर भी बल देना चाहिए। एक एग्जाम के कारण जीवन एक स्टेशन पर नहीं रुकता है। यहाँ ज्यादातर लोग सामान्य होते हैं, असाधारण लोग बेहद कम होते हैं। सामान्य लोग असामान्य काम करते हैं और जब सामान्य लोग असामान्य काम करते हैं तब वे ऊँचाई पर जाते हैं। वर्तमान समय में युवाओं को समझने वाले बेहद कम लोग हैं सभी उनसे बेहतर परिणाम की अपेक्षा करते हैं। 2018 में जब प्रधानमंत्री ने परीक्षा पे चर्चा कार्यक्रम की शुरुआत की तबसे यह युवाओं के लिए संजीवन बूटी जैसी रही है। उन्हें लगता है कि देश का प्रधानमंत्री उन्हें समझने वाला है इससे उनका उत्साह बढ़ता है। 

प्रधानमंत्री तमाम सवालों का बेहद रोचक तरीके से जवाब देते हैं, जैसे सुबह पढ़ाई करें या शाम को? खेलने से पहले पढ़े या बाद में? खाली पेट पढ़ें या खा-पीकर? इन सवालों के जवाब में पीएम मोदी ने छात्रों को बताया कि मुझे एक फिल्‍म याद आती है जिसमें रेलवे स्‍टेशन के पास रहने वाले एक व्‍यक्ति को बंगले में रहने का अवसर मिलता है। वहां उसे नींद नहीं आती तो वह रेलवे स्‍टेशन जाकर रेलगाड़‍ियों की आवाज़ रिकार्ड करता है और वापस आकर टेप रिकॉर्डर में सुनकर फिर सोता है। आशय ये है कि हमें कंफर्टेबल होना जरूरी है। इसके लिए सेल्‍फ असेसमेंट करें और देखें कि आप कब और कैसे पढ़ाई के लिए कंफर्टेबल होते हैं। 

- सचिन समर

दैनिक जागरण inext पटना में 4 फरवरी 2023 को माय व्यू कॉलम में प्रकाशित


Living Life Is An Art | जीवन जीना एक कला है।

यह ब्लॉग राष्ट्रीय अखबार जनसता में प्रकाशित हुआ है। 

जीवन की शुरुआत सीखने और सीखने से से शुरू होता है जिसे बच्चा माता पिता और परिवार से सीखता है । मनुष्य जब तक जीता है वह हर दिन नई बातें सीखता है, और हर नई सीख हमें एक नई दिशा दिखाती है । हर व्यक्ति अपने आप में एक अनूठा फनकार है, और कलाकार होता है जो वह अपने जीवन को दुनियाँ के कैनवास पर उकेरते है । सबकी कृति एकदम सबसे अलग मौलिक और अपने पीछे दुनियाँ में एक अलग छाप छोड़ जाता है । कई लोग है जो अपना पूरा जीवन दुसरो के जीवन में फूल खिलाने में लगा देते है और उनका एक ही धुन रहता है इस दुनियाँ में कोई दुखियारा नहीं रहे। यह है जीवन की यह यात्रा जो सीधी और सरल नहीं है इसमें दुख हैं, तकलीफें हैं, संघर्ष और परीक्षाएं भी हैं। ऐसे में स्वयं को हर स्थिति-परिस्थिति में, माहौल-हालात में सजग एवं संतुलित रखना वास्तव में एक कला है। इसीलिए कहते है कि जीवन जीना भी एक कला है , जिसमे विरले ही अपनी प्रतिभा के साथ न्याय कर पाते है। जो न्याय कर पाते है वही सिकंदर कहलाते है। जन्म लेना हमारे हाथ में नहीं है, लेकिन इस जीवन को सुंदर बनाना हमारे हाथ में है और जब सुख की यह संभावना हमारे हाथ में है तो फिर यह दुख कैसा ? यह शिकायत कैसी ? हम क्यों भाग्य को कोसें और दूसरे को दोष दें ? जब सपने हमारे हैं तो कोशिशें भी हमारी होनी चाहिए। जब पहुंचना हमें है तो यात्रा भी हमारी ही होनी चाहिए। यह जीवन ईश्वर की तरफ से एक अवसर है,इसलिए यह जीवन जीना एक कला है मौका है ।

जीवन में उत्साह और उत्सव होना जरूरी है। ईश्वर ने मनुष्य को ही खुलकर हंसने, उत्सव मनाने, मनोरंजन करने और खेलने की योग्यता दी है। यही कारण है कि सभी हिंदू त्यौहारऔर संस्कारों में संयमित रहकर नृत्य, संगीत और उत्सव से जीवन में सकारात्मकता, मिलनसारिता और अनुभवों का विस्तार होता है। अगर आपको लगता है कि आप जीवन का आनंद नहीं ले पा रहे हैं या फिर आप अपने जीवन से खुश नहीं हैं तो इसका मतलब है कि आपको जीवन जीने की कला नहीं आती। वास्तव में जीवन जीना भी एक कला है ये कला हर इंसान को नहीं आती, कुछ ही लोग होते हैं जो कि कला को सीख पाते हैं। हम बचपन से बहुत ही चीजें सीखने पर जोर देते हैं लेकिन सबसे जरूरी कला को सीखना इस बीच भूल ही जाते हैं ये ही जीवन जीने की कला है। हर चीज का ज्ञान इंसान को इसी धरती पर आकर ही होता है तो अगर आपको भी जीवन जीने की कला नहीं आती है तो ज्यादा परेशान होने ही जरूरत नहीं है। कोई काम तनावपूर्ण नही होता, यह आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप अपने शरीर, मस्तिष्क और भावना को कैसे बनाते है जिससे वह तनाव पूर्ण न लगे। अपनी ज़िन्दगी के मकसद को अपनी जरूरत बना लो, फिर वह तुमसे ज्यादा दूर नही होगी। लोग बाहर से अपनी ज़िन्दगी को पूर्ण करने की कोशिश करते है लेकिन असल में जीवन की गुणवत्ता हमारे अंदर जी जिन्दगी पर आधारित होती है। ज़िम्मेदारी का अर्थ है कि आप अपने जीवन में किसी भी स्थिति का सामना कर सकते हैं। दो लोग एक जैसे नही होते, आप लोगों को समान नहीं कर सकते, आप केवल उन्हें समान अवसर दे सकते हैं। झुंझलाहट, निराशा और अवसाद का मतलब है कि आप स्वयं के विरुद्ध काम कर रहे हैं। समस्याओं में फंसे रहने से बहाने हमेशा नजर आते हैं और अगर आप समाधान खोजते हैं तो रास्ते निकल ही आते है।


जनसत्ता में प्रकाशित 


कोरोना की तुलना में तेजी से वायरल हो रही फर्जी खबरों से सावधान रहें । झूठी खबरें जीवन को सचमुच का खर्च करती हैं ।

Image : I - Stock via Deccan Herald


कोरोनो वायरस के खिलाफ लड़ाई इस बात पर निर्भर करती है कि क्या नागरिकों को इसके बारे में प्रामाणिक जानकारी प्रदान की जा सकती या की जा रही है । कोविद -19 के प्रकोप के बाद से, स्वास्थ्य सेवा ने राजनीति को सोशल मीडिया पर फर्जी खबरों में पछाड़ा है अब मीम्स और जोक्स कोरोना पर बन रहे हैं साथ ही फर्जी खबरें भी इसी से जुड़ी फैलायी जा रही हैं । नीम हकीम और कई अवतारों ने जन्म ले लिया है जो स्वास्थ्य संबंधी सलाह, कोरोनोवायरस को दूर करने के घरेलू उपाय, चमत्कारिक उपचार, षड्यंत्र के सिद्धांत, वायरस को नष्ट करने के अवैज्ञानिक दावे कर रहे हैं..!

कोरोनो वायरस के बारे में सोशल मीडिया पर फर्जी खबरें बीमारी की तुलना में तेजी से वायरल हो रही हैं जिससे नागरिकों को समाचार पत्र या आधिकारिक डब्ल्यूएचओ वेबसाइट जैसे विश्वसनीय स्रोतों के बजाय सोशल मीडिया से अपनी जानकारी प्राप्त करना एक खतरनाक और चिंताजनक मुद्दा है। सोशल मीडिया उस बीमारी के बारे में आतंक पैदा कर सकता है जो अनुचित है, अथवा दूसरे छोर पर यह उग्रता, लोगों को डरा सकता है तमाम तरह के भय को जन्म दे सकता है - जैसे कि व्हाट्सएप में एक तेजी से वायरल हो रही खबर है कि एक के गले के करीब हेयर ड्रायर रखने से इसमें दर्ज कोरोनावायरस नष्ट हो जाएगा, इस तरह की गलत सूचना लोगों को सचमुच मार सकती है।
हमें यह यह ध्यान रखना होगा जो शरारती तत्व इस तरह के सन्देश को वायरल करते हैं उनका मकसद लोगों को भृमित करना होता है । गांवों में लोग तरह - तरह के अंधविश्वास को अपनाना शुरू कर चुके हैं, कुएं में बाल्टी से पानी डालना, दिए जलाना, गौमूत्र पीना आदि..!

अगर सोशल मीडिया की कल्पना मूल रूप से लोगों को परिवार और दोस्तों के साथ संपर्क में रहने में मदद करने के लिए की गई थी, तो दुर्भाग्य से व्हाट्सएप संदेशों, फेसबुक पोस्टों को साझा करने और ट्विटर पर रीट्वीट करने के लिए आज अक्सर "संपर्क में रहने" की प्रक्रिया माना जाता है। इस प्रक्रिया में गलत जानकारी भी बढ़ जाती है । मेरे मोबाइल पर एक नोटिफिकेशन आया कि अब व्हाट्सएप पर प्रसारित खबरों को आप जांच सकते हैं ऐसा फीचर आया है, अगर ऐसा होता है तो काफी हद तक अच्छी ख़बर है लेकिन उसके लिए भी आसान प्रक्रिया होनी चाहिए जिससे उपयोगकर्ता आसानी से उसे जांच ले..! 

सरकार को लोगों में जानकारी के विश्वसनीय स्रोतों को उपलब्ध कराने की आवश्यकता है और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर स्व-विनियमन के उनके दावों के बारे में भी आपत्ति करनी होगी । इससे पहले कि वे गम्भीर सामाजिक मुद्दों पर विशेषज्ञ बनकर ज्यादा नुकसान पहुंचा सकते हैं । साथ ही दहशत फैलाने, नीम हकीम फैलाने और जान को खतरे में डालने से बचने के लिए प्लेटफार्मों को तत्काल सुधार हेतु कार्रवाई करनी चाहिए, या ऐसा करने के लिए कुछ नियम बनाया जाना चाहिए । तत्काल में चूंकि सरकार की शक्ति उन्हें विनियमित करने के लिए प्रतिबंधित है और उनके हाथ में बहुत कुछ नही हैं, यदि उनके सर्वर विदेश में हैं, तो उन्हें अपने डेटा को स्थानीय सर्वर पर संग्रहीत करने के लिए प्रयास करने चाहिए..! इस प्रक्रिया में बड़े व्यवधान के साथ अगर कोविद -19 के प्रयासों में अपेक्षा से अधिक समय लगता है, तो ये ऐसे कार्य हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है । सबसे महत्वपूर्ण बात सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं को भी विवेक का उपयोग करना होगा कि वे केवल विश्वसनीय स्रोतों से उनकी जानकारी प्राप्त करें..!

© सचिन समर

भाषा, भाषा-प्रयोक्ता की सोच, उसके सामाजिक सम्बन्धों तथा उसके सामाजिक परिवेश को उद्घाटित करने में एक अहम भूमिका निभाती है



मनुष्य अपनी भाषा की हदें तोड़ता है। अपनी सीमाओं को अतिक्रमित करता दिखता है। वह अपनी भाषा में वैज्ञानिकता के नए सन्दर्भ एवं प्रमाण जोड़ता है। क्लोद लेवी स्ट्राॅस की दृष्टि भाषा की मौजूदा वस्तुस्थिति पर है। भेड़चाल के उलट वह जड़ परिपाटी से खुद को अलगाते हुए कहते हैं-‘‘समाज या संस्कृति को भाषा में तब्दील किए बगैर हम इस कोपरनिकस जैसी वैचारिक क्रान्ति की शुरुआत नहीं कर सकते हैं जो पूरे समाज को सम्प्रेषण के सिद्धान्त की अभिव्यक्ति के रूप में देखता है।’ 

कई बार हम भाषा की बोधगम्यता, दुरूहता और उसकी सम्प्रेषणीयता को लेकर हाय-तौबा मचाते हैं जबकि कोई भाषा न दुरूह होती है और न सरल; वह समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए समभाव से सेवामाध्यम (Service Tools) के रूप में प्रयुक्त होती है। वह जाति, वर्ग, समुदाय, सम्प्रदाय इत्यादि के छिछले विभाजन से ऊपर की चेतना को संकेतित करती है। किसी भी भाषा की बोधगम्यता सम्बद्ध विषय एवं पाठक या श्रोता की शिक्षा, रुचि तथा संस्कार पर निर्भर करती है। जो भाषा एक सुसंस्कृत एवं सुशिक्षित व्यक्ति के लिए बोधगम्य है, वही असंस्कृत और अशिक्षित व्यक्ति के लिए दुरूह हो सकती है।

संवादधर्मी चिन्तन के विस्तृत फ़लक एवं बहुआयामी दृष्टिकोण को आधारभूत लक्ष्य मानते हुए देखें तो रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव की बात उपयुक्त जान पड़ती है,- ‘भाषा, भाषा-प्रयोक्ता की सोच, उसके सामाजिक सम्बन्धों तथा उसके सामाजिक परिवेश को उद्घाटित करने में एक अहम भूमिका निभाती है। भारत जैसे बहुभाषिक और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के सन्दर्भ में तो भाषा का समाज संदर्भित अध्ययन और भी सार्थक सिद्ध होता है। साथ ही राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी भाषा-समुदाय, उसकी अधीनस्थ बोलियाँ, उसकी साहित्यिक शैलियाँ तथा उसके प्रयोजनमूलक विकल्पों के समूह हिंदी भाषा के समाज संदर्भित अध्ययन को प्रचुर सामग्री उपलब्ध कराते हैं।’

एक जरूरी बात यह कि हम हमेशा जीवंत संवाद, साहचर्य और आत्मीय बर्ताव जाहिर करने के लिए एक-दूसरे को कोचें, हिलाएँ-डुलाएँ, गतिमान बनाएँ; क्योंकि जड़, स्थिर, निष्प्रभ, निष्क्रिय हो जाना मानुष स्वभाव हरग़िज नहीं है। ऐसे में भारतीय भाषा-दर्शन सहित कार्ल माक्र्स की द्वंद्वात्मक-चिन्तन पद्धति हमारे लिए सहज पाथेय है जो यह मानती है कि ‘संसार का विकासक्रम वाद(थीसिस), प्रतिवाद(एंटी थीसिस) एवं संवाद(सिंथीसिस) के त्रैत से सर्वदा ऊध्र्वगामी होता है।’


(‘संचार की संस्कृति’ विषय पर प्रो. अवधेश नारायण मिश्र से राजीव रंजन प्रसाद की बातचीत पर आधारित)